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SC/ST एक्ट विवाद: हिंसा पर उतरे दलित प्रदर्शनकारी

02/04/18/एजेंसी : एससी-एसटी एक्ट में सुप्रीम कोर्ट की तरफ से किए गए बदलाव के खिलाफ दलित संगठनों और राजनीतिक दल सड़क पर उतर कर देश की रफ्तार को रोक दिया और देखते ही देखते पंजाब यूपी और एमपी में आंदोलन उग्र हो गया। यही नहीं एमपी के मुरैना में एक की मौत भी हो गई। एमपी, बिहार, पंजाब, ओडिशा,यूपी, छत्तीसगढ़, चेन्नई राजस्थान गुजरात सहित देश के सभी राज्य आंदोलन की चपेट में आ गए। विरोध के स्वर मोदी सरकार के खिलाफ थे लेकिन…. सच कुछ और ही है। और वो ये है कि जो फैसला कोर्ट ने लिया है उसका दोष सरकार पर मढ़कर कुछ राजनीतिक दल दलितों के नाम पर केंद्र सरकार को कटघरे में करना चाह रहे हैं ताकि दलित वोट साधने में उन्हें आसानी हो….. दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने 20 मार्च को महाराष्ट्र के एक मामले को लेकर एससी एसटी एक्ट में नई गाइडलाइन जारी की थी, जिस पर दलितों के हित की बात करने वालों ने बवाल मचा दिया, उनका कहना है कि इस तरह से तो कभी दलितों का शोषण बंद नहीं होगा। हालांकि  सुप्रीम कोर्ट ने जो दलील दी है उसके हिसाब उसने ऐसा… कानून के दुरुपयोग होने से बचने के लिए किया है जबकि दलित संगठनों की मांग है कि अनुसूचित जाति, जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम 1989 में संशोधन को वापस लेकर एक्ट को पहले की तरह लागू किया जाए…. लेकिन सवाल ये खड़ा होता है कि क्या अपनी मांगों को मनवाने के लिए राष्ट्र संपत्ति को नुकसान पहुंचाना जायज है…..क्या भारत बंद ही एक मात्र समाधान है

जानिए एक्ट में हुए बदलावों के खिलाफ प्रदर्शन की वजह क्या है ?

कब आया था सुप्रीम कोर्ट का फैसला?

21 मार्च को कोर्ट ने एससी/एसटी एक्ट 1989 के तहत दर्ज मामलों में तत्काल गिरफ्तारी पर रोक लगाई

कोर्ट का फैसला…सरकारी कर्मचारियों की गिरफ्तारी सिर्फ सक्षम अथॉरिटी की इजाजत के बाद ही हो सकती है।

जो लोग सरकारी कर्मचारी नहीं है, उनकी गिरफ्तारी एसएसपी की इजाजत से हो सकेगी।

कोर्ट ने यह साफ किया गया है कि गिरफ्तारी की इजाजत लेने के लिए उसकी वजहों को रिकॉर्ड पर रखना होगा।

क्या हैं नई गाइडलाइंस?

ऐसे मामलों में निर्दोष लोगों को बचाने के लिए कोई भी शिकायत मिलने पर तुरंत मुकदमा दर्ज नहीं किया जाएगा।

सबसे पहले शिकायत की जांच डीएसपी लेवल के पुलिस अफसर की तरफ से शुरुआती जांच की जाएगी।

यह जांच समयबद्ध होनी चाहिए।

जांच किसी भी सूरत में 7 दिन से ज्यादा समय तक न हो।

डीएसपी शुरुआती जांच कर नतीजा निकालेंगे कि शिकायत के मुताबिक क्या कोई मामला बनता है…

…या फिर तरीके से झूठे आरोप लगाकर फंसाया जा रहा है?

सुप्रीम कोर्ट ने इस एक्ट के बड़े पैमाने पर गलत इस्तेमाल की बात को मानते हुए कहा कि…

… इस मामले में सरकारी कर्मचारी अग्रिम जमानत के लिए आवेदन कर सकते हैं

– जातिसूचक शब्द इस्तेमाल करने के आरोपी को मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने पर आरोपी की हिरासत बढ़ाने का फैसला लेने से पहले गिरफ्तारी की वजहों की समीक्षा करनी चाहिए।

– सबसे बड़ी बात ऐसे मामलों में तुरंत गिरफ्तारी नहीं की जाएगी।

सरकारी कर्मचारियों की गिरफ्तारी सिर्फ सक्षम अथॉरिटी की इजाजत के बाद ही हो सकती है.

– सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुताबिक, इन दिशा-निर्देशों का उल्लंघन करने वाले अफसरों को विभागीय कार्रवाई के साथ अदालत की अवमानना की कार्रवाही का भी सामना करना होगा.

अब तक थे ये नियम?

– एससी/एसटी एक्ट में जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल संबंधी शिकायत पर तुरंत मामला दर्ज होता था.

– ऐसे मामलों में जांच केवल इंस्पेक्टर रैंक के पुलिस अफसर ही करते थे.

– इन मामलों में केस दर्ज होने के बाद तुरंत गिरफ्तारी का भी प्रावधान था.

– इस तरह के मामलों में अग्रिम जमानत नहीं मिलती थी. सिर्फ हाईकोर्ट से ही नियमित जमानत मिल सकती थी.

– सरकारी कर्मचारी के खिलाफ अदालत में चार्जशीट दायर करने से पहले जांच एजेंसी को अथॉरिटी से इजाजत नहीं लेनी होती थी.

– एससी/एसटी मामलों की सुनवाई सिर्फ स्पेशल कोर्ट में होती थी.

 

 

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